क्या राजनीतिक दलों की नजर में महिलाओं की पहचान बदल रही?

2,373 views · Published 27 November 2018 · 4:18 · Indexed 27 September 2026

Channel: Down To Earth · 2018 · News & Politics

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देश में शायद पहली बार हुआ जब चुनाव के पहले महिलाओं को ध्यान में रखकर शपथपत्र लाया गया. मध्य प्रदेश इसका गवाह बना जहां भारतीय जनता पार्टी ने मुख्य घोषणापत्र के साथ ‘नारी शक्ति संकल्प पत्र’ भी जारी किया. इसमें महिलाओं के शसक्तीकरण से जुड़े ढेर सारे वादे किये गए. जैसे होनहार छात्राओं के लिए स्कूटी देने का वादा. कांग्रेस भी पीछे क्यों रहती उसने भी सस्ते दामों स्कूटर उपलब्ध कराने का वादा कर डाला. छत्तीसगढ़ में भी महिलाओं और स्वयं सहायता समूह को व्यसाय के उद्देश्य से दो लाख और पांच लाख का ब्याजरहित कर्ज देने का वादा किया जा रहा है. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी यही स्थिति थी.

 उत्तरपदेश और अन्य राज्यों में महिला वोटर को लुभाने के लिए प्रेशर कुकर से लेकर, वृद्ध महिलाओं को पेंशन और छात्राओं को साईकिल देने का वादा किया गया. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को प्रमुख मुद्दा बनाया.

आखिर क्यों? क्या देश की राजनितिक में महिला वोटर का दबदबा बढ़ रहा है?

लेकिन अभी ऐसा होता दिख नहीं रहा है. आंकड़ों से समझते हैं. देश के पहले लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ और कुल 489 सांसद चुने गए. इनमें महिला सांसदों की संख्या महज 22 थी. 2014 में देश ने सोलहवें लोकसभा का चुनाव देखा जिसमें कुल 543 सांसद चुने गए. इसमें महिला सांसदों की संख्या 61 थी. पहले लोकसभा चुनाव से अब तक महिला सांसदों को प्रतिशत 4.4 से बढ़कर 11.2 हुआ है जो किसी भी नज़र से संतोषजनक नहीं है.

महिलाओं  को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का बिल कई सालों से सत्ता के गलियारों में धुल चाट रहा है. लेकिन आज उडीसा से खबर आ रही है कि वहाँ के विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण  देने पर सहमती बन गयी है.

अब देखना यह है कि क्या यह सब छिटपुट प्रयास हैं या किसी दूरगामी परिवर्तन की शुरुआत. देखना यह भी है कि देश की आधी आबादी वोटर से नीतिनिर्माता बनने में कितना समय लेती हैं.

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